कश्‍मीर पर कांग्रेस अपने गिरेबान में झांके, नेहरु का बोया काट रहे हैं मोदी !

जिन लोगों के दिमाग में रत्‍ती भर भी इस बात का शक है कि कश्‍मीर की समस्‍या के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिम्‍मेदार हैं। या फिर बीजेपी जिम्‍मेदार है या फिर एनडीए जिम्‍मेदार है। या फिर आरएसएस जिम्‍मेदार है। तो सबसे पहले वो अपने इस कंफ्यूजन को क्‍लीयर कर लें। लोगों को ये पता होना चाहिए कि आज हमारे कश्‍मीरी भाईयों को जिस हालात से गुजरना पड़ रहा है या फिर घाटी के जिन हालात से जूझना पड़ रहा है उसका जिम्‍मेदार कोई और नहीं बल्कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु थे। उनकी नीतियां थीं।

कांग्रेस आज कश्‍मीर के मसले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने की कोशिश कर रही है। लेकिन, इससे पहले उसे अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। इतिहास पर नजर दौड़ानी चाहिए। अगर कांग्रेस के भीतर इतिहास में दाखिल होने की हिम्‍मत नहीं है तो कम से कम हम तो आपको सच से सामना करा ही सकते हैं। आजाद भारत के सबसे पहले भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने लिखा था कि ये बेहतर होता कि नेहरू को विदेश मंत्री और सरदार बल्‍लभ भाई पटेल को देश का प्रधानमंत्री बनाया जाता। तब भारत में ना तो कश्‍मीर की समस्‍या रहती और ना ही तिब्बत, चीन और दूसरे विवादों की कोई समस्या होती।

देश में चाहे चीन की समस्‍या हो या फिर कश्‍मीर की दोनों ही मुद्दों पर जवाहर लाल नेहरु पर ऊंगलियां उठती ही रही हैं। ऐसा नहीं है कि कश्‍मीर के हालात के लिए नेहरु को सिर्फ विपक्ष ही जिम्‍मेदार ठहराता है, उनकी पार्टी के नेता भी उन्‍हें कठघरे में खड़ा करते हैं। कश्‍मीर के मुद्दे पर नेहरु ने कभी भी सरदार पटेल की राय से इत्‍तेफाक नहीं रखा। यही वजह है कि आज नेहरु के फैसले देश के लिए बोझ बन गए हैं। घाटी में रोज होने वाली हत्‍याओं के कारण बन गए हैं।

कश्‍मीर पर नेहरु की सबसे बड़ी गलती ये रही है कि वो इस मामले को लेकर संयुक्‍त राष्‍ट्र गए। दूसरे उन्‍होंने 1948 में भारत-पाक की जंग के बीच अचानक ही सीजफायर का एलान कर दिया। नेहरु की तीसरी सबसे बड़ी भूल ये थी कि उन्‍होंने आर्टिकल 370 के जरिये कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दे दिया। हालांकि तमाम लोग नेहरु के इस फैसले को उस वक्‍त के हालात के हिसाब से ठीक बताते हैं लेकिन, नेहरु के इन फैसलों का विरोध करने वालों की संख्‍या बहुतायत में है।

दरअसल 1947 में भारत के आजाद होने के साथ ही देश की 565 रियासतें भी आजाद हो रही थीं। उनके सामने ये विकल्‍प रखा गया था कि वो चाहें तो भारत का हिस्‍सा बन सकते हैं या चाहें तो पाकिस्‍तान चले जाएं। लेकिन उस वक्‍त कश्मीर के महाराजा हरि सिंह कश्मीर को आजाद मुल्क के तौर पर रखना चाहते थे। उन्‍होंने 15 अगस्‍त तक कोई भी फैसला नहीं किया था। लेकिन, राजा हरि सिंह को ये पता नहीं था कि कश्‍मीर की चाहत में पाकिस्‍तान किस हद तक गिर सकता है।

आजादी के दो महीने बाद ही यानी 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्‍तानी कबायलियों ने कश्‍मीर पर हमला बोल दिया। तब राजा हरि सिंह ने भारत से सैन्‍य मदद मांगी और भारत में जुड़ने का फैसला किया। बताया जाता है कि जब राजा हरि सिंह अपनी जान बचाकर और मदद मांगने नेहरु के पास पहुंचे तो उस वक्‍त उनके घर पर शेख अब्‍दुल्‍ला भी मौजूद थे। राजा हरि सिंह ने नेहरु के सामने कश्‍मीर के भारत में विलय की बात रखी, साथ ही एक शर्त भी रख दी। राजा ने कहा कि आप आज ही भारतीय सेना को कश्‍मीर भेज दीजिए ताकि वहां के लोगों की जान बचाई जा सके।

इस पर नेहरु ने गुस्‍साते हुए राजा हरि सिंह को वहां से भाग जाने को कह दिया था। जिसके बाद शेख अब्‍दुल्‍ला ने नेहरु को शांत कराया। इसके बाद नेहरु ने कश्‍मीर विलय के कागजात पर दस्‍तखत कराए जिसे 27 अक्‍टूबर को भारत सरकार ने मंजूरी दे दी। जिसके बाद भारतीय फौज को कश्‍मीर भेजा गया। पाकिस्‍तान के इस रुख को देखने के बाद कश्‍मीर की आवाम ने फैसला कर लिया था कि अब वो किसी भी सूरत में पाकिस्‍तान के साथ नहीं रहेंगे। क्‍योंकि पाकिस्‍तान उन्‍हें कुचलना चाहता था मारना चाहता था। जबकि भारत ने यहां के आवाम की हिफाजत की।

लेकिन, नेहरु ने इस स्‍वर्णिम अवसर को गंवा दिया और 2 नवंबर 1947 को उन्‍होंने कहा कि हम इस बात के लिए तैयार हैं कि जब कश्मीर में शांति व्यवस्था और कानून पूरी तरह स्थापित हो जाए तो संयुक्त राष्ट्र जैसी इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन की देखरेख में जनमत संग्रह करवाया जाए। ये वो वक्‍त था जब भारतीय फौज पाकिस्‍तान को करारा जवाब दे रही थी। लेकिन, उनका ये रेडियो संदेश बेहद चौंकाने वाला था। और इसके बाद गलतियों की झड़ी लगती चली गई। अब उसी कांग्रेस को कश्‍मीर पर मोदी की नियत में खोट नजर आती है। जरा सोचिए।