रियो ओलंपिक: राजकुमारी कुशवाहा देश से पूछ रही हैं, मेरे पिता को क्यों नहीं मिला भारत रत्न ?

रियो में चल रहे ओलंपिक गेम्स में सभी की नजरें इस बात पर टिकी हुई है कि आखिर कब भारत पदक जीतेगा। अभी तक खेली गई किसी भी स्पर्धा में भारत ने कोई भी पदक नहीं जीता है। 120 सदस्यों के भारतीय दल में अभी तक कोई भी खिलाड़ी देश के लिए पदक नहीं जीत पाया है। हालांकि पहली बार जिमनास्ट में भारत की ओर से दीपा कर्माकर ने इतिहास रचते हुए फाइनल में जगह बनाई है।

लेकिन मुद्दा यह है कि भारत को तीन बार हॉकी में गोल्ड मेडल दिलाने वाले भारतीय फील्ड हॉकी के भूतपूर्व खिलाड़ी एवं कप्तान ध्यानचंद सिंह को अभी तक भारत रत्न क्यों नहीं दिया गया? यह मुद्दा इसलिए भी गरमया हुआ है क्योंकि रियो ओलंपिक में सभी की नजरें इस बात पर टिकी हुई है कि कम से एक पदक भारत को मिले।

राष्ट्रीय खेल दिवस जो कि मेजर ध्यानचन्द की जयंती के दिन मनाया जाता है। इसी दिन उत्तम प्रदर्शन करने वाले भारतीय खिलाडियों को राष्ट्रपति भवन में भारत के राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किया जाता है। जिनमे राजीव गाँधी खेल पुरस्कार, अर्जुन पुरस्कार और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रमुख है। इस दिन देश भर में कई खेल टूर्नामेंट्स आयोजित किये जाते हैं। सवाल यह है कि ध्यानचंद के नाम पर खेल दिवस का आयोजन तो किया जाता है लकिन अभी तक देश के सर्वोच्च सम्मान से नहीं नवाजा गया।

सोशल मीडिया पर इस बात का जमकर विरोध जताया जा रहा है कि अभी तक उस व्यक्ति को भारत रत्न क्यों नहीं दिया गया जिसने अपनी प्रतिभा और कला से देश का नाम विश्व के कौने-कौने में रोशन किया है। ध्यानचंद सिंह ने भारत को सबसे ज्यादा तीन ओलंपिक गोल्ड मेडल दिलाए (1928, 1932 और 1936) लेकिन उन्हें भारत रत्न नहीं मिला है।

Dilip C Mandal ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है कि "जो देश पाखंडी रविशंकर को, जिसे पर्यावरण कानून तोड़ने के जुर्म में सजा हुई है, उसे पद्म विभूषण देता हो और हॉकी के जादूगर ध्यानचंद को उससे कमतर पद्म भूषण.... उस देश को मेडल के लिए तरसना ही होगा।"

तो वहीं दूसरी ओर इसी कड़ी में मंजीत कुमार ने लिखा कि "राजकुमारी कुशवाहा के पापा को भारत रत्न देने में किसे दिक्कत है? भारत के खेल इतिहास में इनसे महान कौन खिलाड़ी हुआ है? ओलंपिक में तीन गोल्ड मेडल कोई मजाक है क्या? जो देश अपने खेल रत्नों का सम्मान करना नहीं जानता, उसे मेडल के लिए तरसना पड़ता है।"

Dilip C Mandal ने एक बार फिर सभी लोगों का इस मामले पर ध्यान खिंचते हुए लिखा कि " ध्यानचंद लिखें या ध्यानचंद सिंह कुशवाहा या ध्यानचंद कुशवाहा चंद्रवंशीय क्षत्रीय.... क्या फर्क पड़ता है? भूल जाइए कि वह किस जाति का था. मुद्दे की बात यह है कि वह भारतीय खेल इतिहास का महानतम खिलाड़ी था, उसने भारत को तीन ओलंपिक गोल्ड मेडल दिलाए, वह हॉकी का जादूगर था और भारत रत्न तो छोड़िए, उसे पद्म विभूषण भी नहीं दिया गया. देश ध्यानचंद की बेटी राजकुमारी कुशवाहा को मुंह दिखाने के काबिल नहीं है. किस किस को दे दिया भारत रत्न. एक हमारे प्रिय दद्दा को नहीं दिया.

इसके साथ-साथ Dilip C Mandal ने लिखा कि " जिस ध्यानचंद सिंह कुशवाहा ने भारत को सबसे ज्यादा तीन ओलंपिक गोल्ड मेडल दिलाए (1928, 32, 36) उन्हें भारत रत्न नहीं मिला है. पद्म विभूषण तक नहीं मिला जो रजत शर्मा को मिल चुका है. ध्यानचंद को सम्मानित करने का मामला पद्म भूषण पर ठहर गया.... ओलंपिक में ऐसे देश की झोली खाली है, तो क्या आश्चर्य. सोचिए, पेप्सी विक्रेता तेंडुलकर को भारत रत्न और दुनिया के महानतम हॉकी खिलाड़ी ध्यानचंद को पद्म भूषण! पद्म विभूषण भी नहीं! भारत में जातिवाद खत्म हो चुका है! मध्य प्रदेश के सागर शहर में रह रही ध्यानचंद की बेटी राजकुमारी कुशवाहा से पूछिए इस बात का कितना दर्द है उन्हें. ब्रिटेन की संसद ने ध्यानचंद का सम्मान किया, पर देश ने उन्हें भारत रत्न नहीं दिया।"